Ankur Thakar   (Ankur Thakar)
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Joined 9 August 2020


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14 SEP AT 14:02

सुबह जाते है शाम बापसी के घेरो के लिये
हम उजाले बेचते है रात के अंधेरों के लिये.

मुनासिब ना हुआ साथ मुसाफिर सफर में अंकुर.
वफा की सादगी काम नहीं आती फेरो के लिये.

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20 AUG AT 16:51

वफा की व्यथा को सभी के सलाम नहीं होते
हर किसी के हिस्से सीता के राम नहीं होते.

गुमां बहुतों को है यहां खुद की चाहत सफा पे
कान्हा के जैसे सभी राधा के तमाम नहीं होते.

खुद के दर्द का टोकरा भारी जहर ही लगता है.
घोड़े के दर्द जैसे सभी के नाल लगाम नहीं होते

राजा की तरहा राज करो हल्की जेब खाली से.
सच्चे अक्स के नक्स किसी के गुलाम नहीं होते

सफा -पवित्र.

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1 AUG AT 10:18

अब ये शहर गवारा नहीं है. दो वक़्त की रोटी से किसी का गुजारा नहीं है.

बातें तो बहुत करता है हमसफ़र मेरा पर यहाँ कोई दिल हमारा नहीं है.

खुद का इश्क बिसर्जन कर दिया यहां वफा का कोई किनारा नहीं है.

नादानीयों की अदा ने खिलाफ तोहफ़े दीये अब वो अंकुर बेचरा नहीं है.

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15 JUL AT 14:00

1:

दिल तोड़ने का फयादा हुआ क्या?बर्बाद हुआ
जो मोहब्बत में उससे भी ज्यादा हुआ क्या.

2:
इश्क में अब वफा नहीं करेंगे
पहले से मोहब्बत दूसरी दफा नहीं करेगें.

3:
रहने दे ये दरिया भरे आँखों में अब यहां कोई पानी भरने नहीं आता.
ख्याल में आता है अंकुर कभी कभी मगर अब तेरा ख्वाब नहीं आता.

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29 JUN AT 10:08

तेरी वक़्त की कहानी का हक़दार नहीं हूँ.
जिस लहजे से तुझे इश्क था कभी अब मैं
वो किरदार नहीं हूँ.

मेरी पाक वफा से शहर की फितरत ना बदली
अब खुद के लिये भी मेरी मोहब्बत मैं यहां
बफादार नहीं हूँ

खेती पे देश के लुटेरों का दाब का खेल जारी है.
दाना देता था जो जमीं के परिंदो को अब मैं वो ज़मीदार नहीं हूँ .

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5 JUN AT 10:06

मिट्टी सुनहरी सोना काला कैसी ये दागी हुंकार की दुनिया.
मतलब की चादर बेचती कैसी ये खुदा तेरी व्यापार की दुनिया.


ओढ़ के रंग केसरी खुद को खुदा बोलती ये बाजार की दुनिया.
नारी देवी तो ये नर सहांर क्यों ना जाने ये किस कागार की दुनिया.


मुर्दा खबर सुर्खियों में है पैसा लेके लिखती ये अखबार की दुनिया.
बर्दी देश की,वफा घुस से दो को चार बनाती ये कारागार की दुनिया.

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20 MAY AT 10:31

कितनी बार दण्डित और खंडित किया.
मेरे घर से मुझे अवलंबित किया हे खुदा
तुने मुझे क्यों नाम कश्मीरी पंडित दिया.

तोड़ के बस्ती शाख कर दी हस्ती मेरी
राख कर दी लाशो को ना मंडित किया
मुझे क्यों नाम तुने कश्मीरी पंडित दिया.

दो वक़्त की रोटी से भी विलंबित किया.
राशन की कतारों से निलंबित किया हे खुदा
तुने क्यों नाम मुझे कश्मीरी पंडित दिया

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4 MAY AT 7:56

1:
हर गलती की सजा माफ़ी नहीं होती साहब
कुछ गलतियां माफ नहीं की जाती बालिद
2:
सब्र रख ये तुफानी लहरे भी उतर जाएगी
अच्छे की जुबाँ बुरे वक़्त में मुकर जाएगी.
3:
जो जुबाँ का ही पक्का नहीं वो
हिसाब का पक्का कहां होगा.
4:
सुन, यहां कोई किसी का दोस्त नहीं है.
मतलब का सिक्का सबकी जेब में है.
और वो वक़्त वक़्त पे खनकता जरूर है.

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1 MAY AT 12:00

ये नक्श अब बहरे हो रहे है अक्स के जख्म गहरे हो रहे है.

कस्ती छोड़ दी मैंने लहरों के सहारे अब शहरों के पहरे हो रहे है.

शीशे के जैसा बिखर गया तेरे बाद हम अब गुजरे ठहरे हो रहे है.

खैर छोड़िये यहाँ कौन हिसाब देता है
इश्क में जलों को कौन ख़िताब देता है.

नन्हे पैरों में जख्म देख ये समझ आया.
मुफलिसी के हाथों में कौन किताब देता है.

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15 APR AT 9:55

खुदा कहां मरने वाले की रजा पूछता है
बिना बजहा कौन यहां बजहा पूछता है

ज़िन्दगी के टूटे पहियों में हवा भर रहा हूँ
ऐसा क्यों मुझसे ही मेरा सबाल पूछता है.

कच्ची निबं को देख बदला कगार पूछता है
शादी के लिये हर कोई यहाँ पगार पूछता है.

बर्दी वाला हर कोई देश भगत नहीं होता.
बिकने वाला पहले कीमत का इनाम पूछता है

मैं भी था कभी खास ख्याल किसी का.
आज जो हाल किसी और का पूछता है




रजा - मर्जी

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