Devang Pratap Singh   (मुसाफ़िर)
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Joined 21 May 2017


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Joined 21 May 2017
22 AUG AT 12:01

जाते हुओं को मैं ही कभी रोकता नहीं
मेरी बदन सराय में इतनी जगह नहीं

खुश हूँ कि तेरे नाम से जानें हैं सब मुझे
दुख है मगर कि कोई मुझे जानता नहीं

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24 JUN AT 21:16

ग़ज़ल:

तलाशता हूँ मैं रेगज़ारों के बीच खोया नदी का रस्ता
बचा है आँखों में थोड़ा पानी सो कट रहा है सभी का रस्ता

बहुत से पत्थर ख़ुदा बने थे,जो सोचते थे नहीं मिटेंगे
मगर वो कटते ही जा रहे हैं,न रोक पाए नमी का रस्ता

शदीद ग़म का सियाह जंगल,भटक के जिसमें मैं खो गया था
जला के उसको तेरी मुहब्बत बना रही है ख़ुशी का रस्ता

भटक गया हूँ न जाने कैसे,नहीं पता है कहाँ खड़ा हूँ
मैं भूल बैठा हूँ तेरे घर तक ले जाने वाली गली का रस्ता

वहाँ के झरने भी मर चुके हैं वहाँ की मिट्टी भी नम नहीं है
तुम्हारी आँखों में दिख रहा है,मुझे तो सूखी नदी का रस्ता

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15 JUN AT 10:32

ग़ज़ल:

मजबूरियों में रस्ते को घर कर दिया गया
होना तो ये नहीं था मगर कर दिया गया

हर दम लगा के दिल को बराबर से साँस दी
जब जी नहीं सका तो अमर कर दिया गया

हमने बनाना चाहा था मंज़िल पे अपना घर
दीवार ओ दर को रख़्त ए सफ़र कर दिया गया

पहले सभी में बोये गए नफ़रतों के बीज
फिर उनको आग दे के शजर कर दिया गया

जो आग बुझ रही थी उसे फिर जला दिया
पानी की बूँद को भी शरर कर दिया गया

सबको बता दिया कि मैं बेहद उदास हूँ
इतनी सी बात को भी ख़बर कर दिया गया

हमने लगाये पेड़ हैं तेरे ही नाम के
यादों को तेरी बर्ग ओ समर कर दिया गया

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8 JUN AT 13:30

वो भी न जाने कैसा होगा
दिल कहता है अच्छा होगा

जादू होगा उन हाथों में
जिनको तुमने चूमा होगा

दिल दरिया के हर पत्थर पर
नाम तुम्हारा लिक्खा होगा

'नासिर' के शेरों को पढ़कर
याद मुझे तू करता होगा

उन आँखों में दरिया दिखना
बीनाई का धोखा होगा

अच्छा अब चलता हूँ घर को
शायद कोई आता होगा

कितनी कलियाँ खिलती होंगी
जब तू खुल के हँसता होगा

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24 MAY AT 14:52

तख़लीक़ ग़मो की होती है इस दिल से
जितने शेर उदासी पर हैं मेरे हैं

*तख़लीक़- creation

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4 MAY AT 14:31

ग़ज़ल:

मैं तो उदास था ही मगर तुमको क्या हुआ
क्यों दिख नहीं रहा तेरा चेहरा खिला हुआ

गहरी उदास रात के साये से डर गया
लगता है तेरे साथ भी ये हादसा हुआ

मैं सो रहा था आग ने जब सब जला दिया
आकर कोई बता भी दे की कैसे क्या हुआ

इक आदमी का ख़ुद से ही विश्वास उठ गया
जो कुछ हुआ है आज ये बेहद बुरा हुआ

मुझको पता नहीं था कि दिल टूटता है क्यों
अच्छा हुआ जो तुमसे मेरा राब्ता हुआ

इक पेड़ है उदास की पंछी नहीं रहे
पंछी भी सोचते है के पेड़ों का क्या हुआ

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21 APR AT 19:37

ग़ज़ल:

हर कोने में 'सूना सूना' लिक्खा है
बीच में लेकिन नाम तुम्हारा लिक्खा है

नाम तो मेरा है ही तेरे हाथों में
जाने उसके आगे क्या क्या लिक्खा है

पैरों के छाले भी ये बतलाते हैं
तुमने रस्तों पर इक किस्सा लिक्खा है

शायर दुनिया भर को प्यारा लिखते हैं
हमने तो बस तुमको 'प्यारा' लिक्खा है

जिन पंखों को तुमने काटा हाथों से
उन पंखों पर नाम हमारा लिक्खा है

प्यार कि बाज़ी में आख़िर क्या लिख देता
तुमको जीता, ख़ुद को हारा लिक्खा है

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16 APR AT 21:08

मतला और कुछ शेर-

तुम्हें तो कुछ भी नहीं पता है
अभी ये सब कुछ नया नया है

उदास लड़कों से इश्क़ करना
उन्हें पता है ये दर्द क्या है

कोई उदासी को पूजता है
कोई उदासों का देवता है

किसी को मंज़िल नहीं मिली है
किसी की मंज़िल, ये रास्ता है

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17 MAR AT 18:29

यार 'मुसाफ़िर' हद करते हो
इतनी उदासी ठीक नहीं है

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14 MAR AT 15:54

दिल भी तोड़ो प्यार भी माँगो
ये पेड़ कटे और फल भी दे?

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