Rajat Dwivedi   (©रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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24 SEP AT 8:53

तुम अगर पास रहो,
तो ज़िंदगी खुशगवार हो जाए।
तुम, मैं, बारिश, चाय
और अनगिनत बातें।
इससे ज़्यादा सुकून के लिए
और क्या चाहिए!

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22 SEP AT 13:51

मैं तुमसे बेइंतेहा प्यार करता हूं।

ये कहने में मुझे एक पल भी नहीं लगा था।
मगर आज तक समझने में एक अरसा लग गया।

सच है, शब्द तेज़ और सुंदर हो सकते हैं, लेकिन
जज़्बातों की तरह संजीदा और गहरे नहीं।

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20 SEP AT 21:18

दिल पर छाप है जिसकी,
मैं भूलना नहीं चाहता हूं।
तुमसे इस तरह जुड़ गया हूं,
कि दूर हो न पाऊंगा।
हर स्थिति में, हर बार मैं
बस तुम्हें ही अपना बनाऊंगा।

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19 SEP AT 17:46

तुम्हें ख़ुद को साबित करने के लिए
बार बार उपेक्षा सहनी पड़ेगी।

यह औरों के अभिमान के लिए नहीं,
अपितु तुम्हारे चरित्र के निखार के लिए ज़रूरी है।

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19 SEP AT 17:37

हम जब किसी के मापदंड पर खरे नहीं उतरते,
तो महज़ उसकी उपेक्षा के पात्र बन जाते हैं।

हमारी निष्ठा, हमारा स्नेह, हमारा लगाव,
उन्हें एक छलावे से अतिरिक्त कुछ नहीं लगता।

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17 SEP AT 10:15

तुम्हारे सुनहरे चेहरे पर एक चांद लगना बाकी है।
आओ अब इस माथे को बस कुमकुम से सजा दूं मैं।

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17 SEP AT 9:45

जब कहीं कुछ नहीं था, तब भी सब कुछ है- ऐसा लगता था।
आज सब कुछ है लेकिन, तुम्हारे बिन कहीं कुछ नहीं लगता।

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17 SEP AT 9:40

बरसों की भटकन से परेशान,
जो विदा माँगकर दुर्गम पर्वतों से,
नदियों से, किनारों से, पठारों से,
आ पहुंचा इस भीड़ भरे शहर में।
एक पल को बस ठिठक गया
उस बंद कूचे के आखिरी छोर पर,
जहां खुशबू बरसा करती है।

जिसकी सुध लिया फिरता था वो,
सुना है, वह वहां रहा करती है!

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16 SEP AT 13:11

पर्वतों जैसे कठोर मन के सारे संशय
विश्वास की एक हल्की सी तपिश के आगे
पिघलकर मोम की तरह ध्वस्त हो जाते हैं।

मैंने यह तब सीखा जब तुम्हें परखकर,
नित नित मेरा तुम पर विश्वास और बढ़ता गया।

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14 SEP AT 5:39

चाय,
तुम्हारा ख्याल
और
भोर की बरसात।
मुझको मिले और क्या,
सुंदर सौगात!

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